Reason-for-our-unhappiness

दूसरों से भरपूर उम्मीदें ही है हमारे दुखी रहने का कारण, जानिए किन बातों को ध्यान में रखे/ Full of expectations from others is the reason for our unhappiness, know what to keep in mind

आपने शायद यह कहावत सुनी होगी कि उम्मीदें आहत करती हैं। लेकिन ऐसा क्यों करता है? आइए गहराई से जाने!

अपेक्षा न तो वादा है और न ही तर्क। यह मजबूत धारणाओं पर आधारित एक अनुमान है कि भविष्य में क्या हो सकता है। यह सभी जीवंत भावनाओं और भावनाओं का प्रतीक है – प्रेरणा, आशा, प्रत्याशा, विश्वास, भेद्यता, उत्तेजना आदि। यह निम्न या उच्च हो सकता है, यह सब कुछ हो सकता है या कुछ भी नहीं हो सकता है, यह या तो हल्का या अंधेरा हो सकता है। यह एक डूबते हुए अनुभव की तरह है। अपेक्षाओं को प्रबंधित करने में महारत हासिल करना एक ऐसी कला है जिसे हर कोई नहीं सीखता है।

उम्मीदें और रिश्ते का खेल?

हम सभी के पास दोस्तों का एक अच्छा समूह है जो मोटे और पतले के माध्यम से हमारे साथ रहता है। जब किसी रिश्ते में आने की बात आती है, तो सबसे पहली चीज जो हम करते हैं, वह यह है कि हम अपेक्षाएं स्थापित करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इन सभी गुणों में एक व्यक्ति एक ऑलराउंडर होगा। लेकिन जब वह इनमें से एक या दो भूमिकाओं में असफल हो जाते हैं, तो हम निराश हो जाते हैं। एक बार फिर, उम्मीदें आहत हो जाती है

ज्यादातर लोग दूसरों की मदद इसलिए करते हैं, ताकि वह भी वक्त पड़ने पर काम आए। जब ऐसा नहीं होता, तो वे उसे अहसान फरामोश ठहरा देते हैं। तो ऐसे में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, वे खुद बदल जाएंगे, हम बस अपनी चिंता करें।’

उम्मीदों के पिटारे को कम करे

देखा गया है कि मानव कभी कभी खुद से भी ज़्यादा लोगों पर निर्भर रहकर उनसे अपेक्षा करना प्रारंभ कर देता है जो निरर्थक ही मन ही मन में आपको क्षति पहुँचाने का काम करता है। कहने को तो हर रिश्ते उम्मीदो पर ही कायम रहते है पर जब ये अपेक्षाएं अत्यधिक मात्रा में बढने लग जाती है तो यह आपके जीवन में उदासियों के अलावा आपको कुछ नहीं देती है इसलिए अच्छा है कि आप अपने काम पर ही फोकस करें बजाय दूसरों के कि वे क्या कर रहे है क्यों कर रहे है । ऐसा करके हम अपने आपको संतुष्टि दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा बुद्ध ने भी कहा है कि अपेक्षाओ का कोई अंत नहीं होता।

दुनिया को अपनी तरह ना सोचे

अक्सर हम ऐसा सोच लेते है कि हम जैसे है ये दुनिया भी वैसी ही है कईं बार हम अपनी ग़लतियों को भी इस तरह से नज़रअंदाज़ करते है जैसे बस सामने वाला ही आपकी ज़िंदगी के दुख के लिए ज़िम्मेदार है । हो सके तो अपनी ग़लतियों को अनदेखा ना करें जहां कुछ सीखने की किसी से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है वहां हिचकिचाहट ना करें और खुलकर अपने विचारो को शेयर करे।
यह अपेक्षा न करें कि दूसरे खुद को बदलें, बल्कि हम अपने भीतर बदलाव लाएं।

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